शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

हिंदी आलोचना और राजनीति

हिंदी आलोचना और राजनीति

आनंद पांडेय


हिन्दी आलोचना की विचारधारासंवेदना और सरोकार जिस साहित्य से बनते और प्रभावित होते हैंवह राजनीतिक है. जिस समय आलोचना आरम्भ हो रही थीवह नवजागरण का समय है. इसमें राजनीतिक नवजागरण भी शामिल था. यह नवजागरण पश्चिमी और भारतीय संस्कृति के मिलनआपसी द्वंद्व और संवाद की उपज था. भारतेन्दु युगीन साहित्य इसी नवजागरण का साहित्य है. राजनीतिक पराधीनता ने इस समय के लेखकों की राजनीतिक चेतना को प्रखर बना दिया था. उनके सामने यह स्पष्ट था कि देश को जब तक राजनीतिक स्वाधीनता नहीं प्राप्त होगी तब तक उसका कल्याण असंभव है. इसीलिए उस युग में एक नई तरह की राजनीतिक चेतना का विकास हुआ जिसकी अभिव्यक्ति उस समय के बहुप्रचलित पदबंध देशवत्सलता’ में बड़ी अच्छी तरह से होती है. यह देशवत्सलता इस समय की साहित्यिक और राजनीतिक चर्चा का एक प्रमुख विषय और उद्देश्य था. अंग्रेजी साम्राज्य के प्रति राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति के द्वंद्व के बावजूद इन लेखकों का साहित्य भारत में राष्ट्रीयता के विकास का काम करता है. ऐसा लगता है कि राजदंड के कोप से अपनी लेखकीय स्वतंत्रता की रक्षा के लिए इन लेखकों ने राजभक्ति का प्रदर्शन एक रणनीति के तहत किया. हृदय से वे राजभक्त थेऐसा नहीं लगता.

हिन्दी आलोचना जब रामचंद्र शुक्ल के यहां पहुंचती है तब उसमें साहित्य और राजनीति की एकता का अपूर्व विकास होता है. उन्होंने समय-समय पर शुद्ध राजनीतिक और आर्थिक विषयों पर लेखन तो किया ही बल्कि जनता’ को आलोचना में स्थापित भी किया. उनकी आलोचना साम्राज्यवाद-विरोध और भारतीय जनता की मुक्ति-आकांक्षा से लैस है. उनसे पहले यह काम महावीरप्रसाद द्विवेदी ने बड़े प्रभाव के साथ शुरू किया था. शुक्लोत्तर आलोचकों में नंददुलारे वाजपेयी और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी आलोचना के माध्यम से आलोचना और राजनीति के सरोकारों का अपनी-अपनी तरह से विकास किया. साहित्य के साथ-साथ इन आलोचकों ने राजनीति को भी आलोचना का विषय बनाया. दोनों के लक्ष्यों की एकता की परंपरा को दृढ़तर बनाया.

मार्क्सवादी आलोचना में आलोचना और राजनीतिक के लक्ष्य पूर्णतः एक हो गये. मार्क्सवादी आलोचकों का कम्युनिस्ट पार्टी से संबंध थाराजनीति से वे अधिक जीवंत रूप में जुड़े हुए थे. इसलिएराजनीति उनके लिए संवेदना और विचारधारा का ही प्रश्न नहीं थीबल्कि आलोचना-कर्म और जीवन-कर्म का भी अनिवार्य अंग थी. परवर्ती मार्क्सवादी आलोचकों के लिए धीरे-धीरे पार्टी कम महत्वपूर्ण होती गयी और आलोचना अपनी राजनीति में अधिक सघनजीवंत और जनतांत्रिक होती गयीराजनीति से उसका संबंध गाढ़ा होता गया. आज वह एक साथ राजनीतिक भी रह सकती है और एक विधा के रूप में अपने स्वभाव की रक्षा और सम्मान भी कर सकती है.

मार्क्सवादी आलोचना के विपरीत एक ऐसी आलोचना-धारा सक्रिय रही और है जिसकी मान्यता है कि साहित्य को राजनीति या अन्य अनुशासनों का उपनिवेश नहीं बनाया जाना चाहिए. हालांकिउसकी इस मान्यता के राजनीतिक निहितार्थ समय-समय पर स्पष्ट होते रहेफिर भी वह राजनीति से दूर नहीं रही. उसमें राजनीतिक सरोकार न केवल मौजूद हैं बल्कि वह राजनीति से उस रूप में दूर भी नहीं हैन होना चाहती हैजिस रूप में आमतौर पर माना या प्रचारित किया जाता है.

हिन्दी आलोचना के विकास में साहित्यिक विवादों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. ये विवाद साहित्यिक होने के साथ-साथ वैचारिक और राजनीतिक भी हैं. हिन्दी आलोचना का एक बड़ा हिस्सा वाद-विवाद और संवाद के रूप में लिखा गया है. उनमें साहित्य और राजनीति के सार्वभौम और सार्वकालिक मुद्दों को शामिल किया गया है. इन विवादों के कारण प्रायः राजनीतिक रहे हैं और राजनीति ही उनकी दिशा तय करती रही है. इन विवादों में हिन्दी आलोचना के गहरे राजनीतिक सरोकार और राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में उसके व्यवहार स्पष्ट रूपों में व्यक्त हुए हैं.

हिन्दी आलोचना की राजनीतिक प्रक्रियाराजनीति से संबंध और उसके राजनीतिक सरोकारों के अध्ययन की दृष्टि से बीसवीं सदी के अंतिम दशक की आलोचना एक प्रासंगिक विषय है. यह समयावधि कई मायने में निर्णायक रही है. इसी में रूस की समाजवादी सत्ता का पतन हुआ फलतः विश्व पूंजीवाद के पक्ष में एकधुवीय हो गया. फलतः अमरीकी नवसाम्राज्यवाद और पूंजीवाद के लिए पूरा मैदान खाली हो गया. भारत में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया जोर-शोर से आगे बढ़ी. बाबरी मस्जिद गिरा दी गयी और पहली बार हिन्दू साम्प्रदायिक फासीवाद सत्ता के केन्द्र पर स्थापित हुआ. ये सब घटनाएं युगांतकारी थीं और दूरगामी असर डालने वाली भी. हिन्दी आलोचना ने इस दौर के संकटों को सभ्यता और संस्कृति के लिए अभूतपूर्व संकट के रूप में लिया. इसके प्रतिरोध के लिए वह उठ खड़ी हुई.

इसी दशक में कुछ सकारात्मक परिवर्तन हुए जिनसे न केवल सामाजिक परिवर्तन को गति मिली बल्कि प्रतिगामी शक्तियों से संघर्ष की ताकत भी मिली. मंडल आयोग की शिफारिशें लागू की गयींफलस्वरूप सामाजिक संबंधों में हो रहे बदलाव को ऐतिहासिक गति मिली. देश के अधिकांश राज्यों में पिछडे़ और दलित समुदायों के नेता सत्ता के केन्द्र बने. स्त्री और दलित संघर्षों ने आन्दोलन की शक्ल अख्तियार की. स्त्री और दलित अस्मिताओं के आलोचनात्मक और राजनीतिक विमर्श ने साहित्य की परम्परागत अवधारणाप्रतिमानों और भाषा को अपर्याप्त साबित किया. हिन्दी आलोचना ने इन परिवर्तनों में हस्तक्षेप किया तथा इनके लिए वैचारिकसाहित्यिकसांस्कृतिक और राजनीतिक आधार भी तैयार किया.

इस दौर में हिन्दी आलोचना जिन समस्याओं और चुनौतियों से जूझती है उनमें उपनिवेशवादी मानसिकतापूंजीवादी अर्थव्यवस्था और संस्कृतिसाम्प्रदायिकताफासीवादजातिवादपुरूषवाद और सामंतवाद तथा अस्मिता की राजनीति प्रमुख हैं.

उदारीकरण के माध्यम से पूंजीपतियों ने राजसत्ता पर कब्जा कर लिया और उसे अपने साधन और सहयोगी के रूप में इश्तेमाल करना शुरू कर दिया. इससे राज्य की ताकत कम हो गई. फलस्वरूपनब्बे के दशक में राजसत्ता के साथ हिन्दी साहित्य और आलोचना का संबंध बदल गया. पहले जहां किसी भी शोषण और अत्याचार के लिए राज्य को जिम्मेदार मानकर साहित्य और आलोचना सत्ताधारियों और उसकी विचारधारा की आलोचना करती थी वहीं उदारीकरण के बाद जब राज्य कमजोर हो गया और इसका एहसास भी साहित्यकारों को हुआ तो उन्होंने राज्य का विरोध करने की बजाय सीधे-सीध पूंजीवाद को लक्षित किया. उनकी समझ स्पष्ट है पूंजीवाद ही असली सत्ता है. रचना और आलोचना ने पूंजीवादी विचारधारा और संस्कृति की अमानवीयता के विभिन्न पहलुओं को उजागर कर उसके प्रति प्रतिरोध दर्ज कराना शुरू किया. यह हिन्दी रचना और आलोचना की पूंजीवादउदारीकरण और राजसत्ता की गहरी समझ का परिणाम है.

हम देखते हैं कि बीसवीं सदी की हिन्दी आलोचना ने अपने समय की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में भूमंडलीकरणबाजारवाद और नव साम्राज्यवादसांस्कृतिक साम्राज्यवाद की राजनीति तथा उसके भारत में स्थापित और प्रोत्साहित करने वाली उदारीकरण की राजनीति को न केवल पहचानती है बल्कि उसके द्वारा उत्पन्न चुनौतियों से भारतीय जनता की रक्षा के लिए चिंतित भी है. इसके साथ ही साथ वह वैचारिक और सांस्कृतिक स्तरों पर उसके प्रतिरोध के प्रति जागरूक और सक्रिय भी है. उसने न केवल वैचारिक और सैद्धांतिक स्तरों पर ऐसा किया है बल्कि हिन्दी रचनाशीलता में निहित साम्राज्यवादबाजारवाद तथा सांस्कृतिक आतंक और वर्चस्व की विरोधी चेतना की खोज और समर्थन के स्तर पर भी ऐसा किया है. अपने समय और समाज के प्रति जागरूक और जनता के हितों के प्रति प्रतिबद्ध आलोचना का उदाहरण पेश किया है.

बीसवीं सदी के अंतिम दशक को रचना और आलोचना के अनुकूल तथा जनता के लिए कल्याणकारी बनाने के लिए आलोचना ने जो वैचारिक और आलोचनात्मक संघर्ष किया उसकी वजह से उसकी छवि राजनीति और विचारधारा केन्द्रित आलोचना-धारा की बन गयी. लेकिनवह साहित्य को साहित्य की तरह लेती है और आलोचना को आलोचना की तरह. वह राजनीतिक हैलेकिन राजनीति शास्त्र नहीं हैवह आर्थिक समस्याओं के प्रति जागरूक हैलेकिन अर्थशास्त्र नहीं हैवैसे ही वह दर्शन से संपृक्त और विचारधारात्मक हैलेकिन शुष्क विचारधारा-विमर्श नहीं. वह साहित्य और आलोचना को सामाजिक उत्पाद मानती हैइसीलिए सामाजिकता उसके लिए मानव-मूल्य के साथ-साथ आलोचनात्मक मान भी है. लेकिनराजनीति से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होने की उसकी परम्परा और आग्रह के कारण उसकी वैचारिक कट्टरता और लेखक संगठनों के माध्यम से खेमेबंदी और जोड़-तोड़ की समस्याओं से वह मुक्त नहीं हो पायी.

बीसवीं सदी के अंतिम दशक में भारतीय समाज के विभिन्न क्षेत्रों- राजनीतिसाहित्यआलोचनाविचारधारा और संस्कृति तथा अर्थव्यवस्था-में आए परिवर्तनों को देखने के बाद यह लगता है कि यह उत्तर आधुनिक समाज है. उपभोक्तावादउदारीकरणराज्य की भूमिका का संकुचनसेवा क्षेत्र में आया विस्तार मीडिया और संचार माध्यमों से नयी और भूमंडलीय संस्कृति का प्रसार. मीडियावेब मीडियाअंग्रेजी भाषा की लगातार बढ़ती लोकप्रियता और वर्चस्व तथा संचार और परिवहन के माध्यमों ने व्यक्ति को एक साथ वैश्विक और स्थानीय बनाना शुरू कर दिया है. भले ही ये परिवर्तन उत्तर आधुनिक विचारधारा या वैचारिकी से प्रभावित नहीं हैं फिर भी इनको उत्तर आधुनिक प्रविधि के आधार पर समझा जा सकता है. इसके अतिरिक्त भारतीय राजनीति में आये अस्मितावादी मोड़ ने भी उत्तर आधुनिक सामाजिक स्थिति का भान कराया है. राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की केंद्रीयता विखंडित होती है और कई छोटे-छोटे जाति और क्षेत्र आधारित दल बनते हैं. इसके अतिरिक्त दो ऐसी और प्रवृत्तियां राजनीति में तेजी से उभरीं जिन्होंने उत्तर आधुनिक स्थिति को स्पष्ट किया. पहली जाति चेतना का राजनीतिकरण हैतो दूसरी हैविचारधारा की बजाय विकास के नारे और धन के आधार पर चुनाव जीतने की प्रवृत्ति. जाति-चेतना ने राजनीति से सवर्णवादी-ब्राह्मणवादी वर्चस्व और उसकी केंद्रीयता को विखंडित कर दिया तथा हाशिए के लोगों को सत्ता के केन्द्र में ला दिया. उत्तर आधुनिकतावादियों के अनुसार यह उत्तर आधुनिक स्थिति है. इसके अलावा चुनाव प्रबंधन और धन तथा विभिन्न जातियों के सिद्धांतहीन गठजोड़ की राजनीति ने विचारधारा की राजनीति के युग को समाप्त कर दिया है. अब राजनीतिक दल शायद ही कभी विचारधारा का हवाला देते हों या रोना रोते हैं. उत्तर आधुनिकता के अनुसार यह विचारधारा के अंत’ की स्थिति है.

बीसवीं सदी के अंतिम दशक में हिन्दी आलोचना ने अस्मितावादी साहित्यिक-आलोचनात्मक विमर्श का सामना कियाफलस्वरूपउसने अस्मितावादी विमर्श और राजनीति के खतरों को भी समझा है. हिन्दी की आलोचना अस्मितावादी विमर्श और अस्मिता की राजनीति के प्रश्न से जूझती है और उस विमर्श पर आधारित राजनीति को आगे बढ़ाती है. समय-समय पर उसके अपने वर्गीय व्यवहार और अस्मितापरक अंतर्विरोधों के साथ-साथ उसकी राजनीति की भी पोल खुली है. बावजूद इसके वह आलोचना अस्मितावादी राजनीति और अस्मितावादी विमर्श की समस्या के प्रश्न का समाधान करने की दिशा में आगे बढ़ी है.

ये अस्मितावादी विमर्श अभूतपूर्व नहीं हैं. इनका बोध और इनके कारण हमारी परम्परा में मौजूद हैं. फिर भी बीसवीं सदी के अंतिम दशक में हिन्दी में अस्मितावादी साहित्य और आलोचना का विकास नये रूप में होता है. यह नयापन स्त्री और दलित साहित्य और आलोचना के रूप में सामने आया है. दोनों साहित्य आन्दोलनों की एक बात में समानता है कि दोनों ने सहानुभूति के परम्परागत सिद्धांत की बजाय आत्मानुभूति पर बल दिया और यह रेखांकित किया कि किसी अस्मिता की सच्ची अभिव्यक्ति उस अस्मितागत इकाई का सदस्य ही कर सकता है. दलित साहित्य के लिए यह जरूरी है कि लेखक दलित हो तो स्त्री साहित्य के लिए जरूरी है कि उसका लेखक स्त्री हो. साहित्य की अवधारणा के लिए स्त्री और दलित लेखकों का यह आग्रह एक चुनौती की तरह सामने आया. भारतीय रिप्रजेंटेटिव लोकतांत्रिक राजनीति में भी इसी तरह यह परिघटना सामने आयी कि दलितों का असली प्रतिनिधित्व दलित ही कर सकता है और स्त्री का प्रतिनिधित्व एक स्त्री ही कर सकती है. जाहिर हैयह केवल भागीदारी का प्रश्न नहीं हैबल्कि अस्मिता की खोज का भी है. प्रतिनिधित्व के लिए अब यह जरूरी नहीं रह गया कि विचारधारा सभी का समान रूप से प्रतिनिधित्व कर सकती है. उत्तर आधुनिकतावादी आलोचना साहित्य और राजनीति इन मान्यताओं का यह कहकर समर्थन करती है कि जिसे साहित्य और विचारधारा कहा जाता है वह महा-आख्यान के रूप में किसी एक अस्मिता विशेष का वर्चस्व है. अस्मिताओं का विमर्श साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में केन्द्रीयता और वर्चस्व का विखंडन है. वर्चस्व के विरूद्ध छोटी और उपेक्षित तथा शोषित और उत्पीडि़त अस्मिताओं का आत्मरेखांकन हैउनके वर्चस्व से मुक्ति है. दलितों की तरह लेखिकाओं ने भी इस बात को रेखांकित किया है कि पुरूष-चरित्र स्त्रियों के दुख-दर्द और उनकी समस्याओं को समझने में बाधक है इसीलिए स्त्रीवादी साहित्य केवल स्त्री ही लिख सकती हैपुरूष नहीं. दलित और स्त्री अस्मिता की लड़ाई की कामयाबी के लिए यह जरूरी था और है कि वे अपने को राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करें और सत्ता व्यवस्था को बदलें. जाति व्यवस्था और पुरूष व्यवस्था का नैरंतर्य उसकी राजसत्ता के रूप में स्वीकृति और उपस्थिति के कारण ही बना हुआ है. स्त्री और दलित अस्मितावादी आलोचना के सामने यह स्पष्ट है कि राजसत्ता को बदले बिना न दलित की मुक्ति हो सकती है और न ही स्त्री की. स्त्री की मुक्ति तो दलित की मुक्ति से और कठिन है.

दलित राजनीति के तर्कोंनारों और भाषा से दलित साहित्य और आलोचना का गहरा संबंध है. उसकी तर्कप्रणाली और समझदारी भी राजनीतिक है. वह दलित अस्मिता की राजनीति और आन्दोलन का अभिन्न हिस्सा है. दलित आलोचना में राजनीति एक केन्द्रीय विषय हैइसलिए उसका स्वभाव राजनीतिक है. दलित साहित्य जिन परिस्थितियों की उपज हैउनमें उसका राजनीतिक होना ही स्वाभाविक है.

दलितों की तरह लेखिकाओं ने भी इस बात को रेखांकित किया कि पुरूष-चरित्र स्त्रियों के दुख-दर्द और उनकी समस्याओं को समझने में बाधक है. स्त्रीवादी साहित्य केवल स्त्री ही लिख सकती हैपुरूष नहीं. नब्बे के दशक की दलित और स्त्री अस्मितावादी आलोचना की लड़ाई की कामयाबी के लिए यह जरूरी था कि वे अपने को राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करें और सत्ता व्यवस्था को बदलें. इसलिए स्त्रीवादी आलोचना प्रक्रिया और सरोकारों के साथ-साथ लक्ष्य की दृष्टि से भी राजनीतिक है.

हिन्दी के स्त्री और दलित-विमर्श हिन्दी भाषा के स्त्री-विरोधी पुरूषवादी और दलित-विरोधी सवर्णवादी चरित्र की आलोचना और उससे मुक्ति के तरीकों पर केन्द्रित हैं. यहां प्रश्न भाषा में निहित स्त्री और दलित-विरोधी संस्कारों और पुरूषवादी-सवर्णवादी विचारों से मुक्ति का है.

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

संसदेतर राजनीति का लोकतंत्र

संसदेतर राजनीति का लोकतंत्र

आनंद पांडेय


अन्ना हजारे का जन लोकपाल भले ही संसद ने पारित न किया हो और उन्हें अपने अनशन को बीच में ही समाप्त कर दीर्घकालिक राजनीतिक कार्यवाई की घोषणा के लिए बाध्य होना पड़ा हो लेकिन वे अपने उद्देश्य और प्रयास में असफल नहीं माने जा सकते हैं। उन्होंने संसद और राजनीतिक दलों की राजनीति के बरक्स संसदेतर राजनीति को जो नया आयाम दिया है वह अपने समय की एक परिघटना है। इस तरह की राजनीति, जो अपने चरित्र में लोकतांत्रिक तो है लेकिन असंसदीय नहीं, संसदेतर है, का भारत में पिछले कई दशकों में विकास हुआ है। इसने लोकतंत्र के घटते राजनीतिक स्पेस को भरने का काम किया है। असल में लोकतंत्र का अपने देश में जिस तरह से विकास हुआ उससे इस तरह की राजनीति के लिए जगह तैयार हुई है। आप इसे सिविल सोसाइटी कहें या गैर सरकारी संस्थाओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा लेकिन इतना तो तय है कि ऐसी राजनीति अब सभी तरह की लोकतांत्रिक वैधताओं के साथ एक लोकप्रिय समानांतर सत्ता बन गई है। आज जनता जिसके पास संसदीय लोकतंत्र में सिर्फ दो-चार दलों का विकल्प था, एक नये लोकतांत्रिक हथियार से लैश हो गई है। ऐसे दलों के पाले-दर-पाले में वह वैसे ही गिरती रहती थी जैसे गेंद, लेकिन अब वह जो काम राजनीतिक दलों से नहीं ले सकती वह ऐसे संगठनों से ले सकती है जैसे अन्ना हजारे ने लिया है।

संसदेतर राजनीति की एक पूरक लोकतांत्रिक राजनीति के रूप में सिविल सोसाइटी की उपस्थिति जहां स्पष्ट है वहीं इसका स्वरूप और विचारधारा अस्पष्ट है। इसने कई सवाल उठाए हैं जिनका जवाब शायद उतना स्पष्ट नहीं हो जितना कि स्वयं ये सवाल हैं। सिविल सोसाइटी या गैर सरकारी संगठन की राजनीतिक भूमिका के उदय एवं विकास के ऐतिहासिक, राजनीतिक एवं सामाजिक कारण क्या हैं? ऐसी राजनीति का सरोकार क्या है? ऐसी राजनीति की विचारधारा क्या है? इसकी प्रतिबद्धता किसके प्रति है? ऐसी राजनीति का संगठन कैसा है? इसका सामाजिक आधार क्या है? संसदीय राजनीति से इसका संबंध कैसा है? इसका वर्ग-चरित्र और जाति-चरित्र कैसा है? इत्यादि प्रश्नों पर विचार करने का समय आ गया है। लगभग नौ महीने चले अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन पर इन सवालों को लगातार उठाया गया है और उनके उत्तर भी दिये गये हैं। कभी इंडिया अगेन्स्ट करप्शन की ओर से सफाई के रूप में तो कभी विरोधियों और आलोचकों की ओर से सवाल या आशंका के रूप में। ये सवाल-जवाब अपनी जगह पर हैं और हमारे समय के राजनीतिक यथार्थ एवं स्थिति को स्पष्ट करते हैं। यहां एक सामान्य विवेचन पेश किया जा रहा है।

इस तरह की अवधारणा या परिघटना के उद्भव और विकास के प्राचीन और पश्चिमी परिप्रेक्ष्य को सुविधा के लिए छोड़कर समकालीन भारतीय राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को लें तो इसे समझना सरल होगा। इसे समझने के लिए इस सवाल का सहारा लें कि यह किसकी भूमिका अदा कर रहा है? यह एक राजनीतिक मांग को पूरा करने के लिए गैर सरकारी संगठनों की मांग भी है, एक समाजसेवी बुजुर्ग की भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष भी है और मध्यवर्गीय लोगों का आन्दोलन भी है। यह शासन के वर्तमान भ्रष्ट रूप को उजागर करता है और एक पारदर्शी व्यवस्था की मांग करता है। यों तो इस तरह के आन्दोलन वर्तमान भारतीय जीवन के सामाजिक और राजनीतिक लगभग सभी पक्षों को लेकर चल रहे हैं ; मसलन पर्यावरण का प्रश्न, आदिवासी हितों का प्रश्न, मानवाधिकार का प्रश्न, विकास एवं पूंजीवादी शोषण का प्रश्न, सूचना के अधिकार का प्रश्न, रोजगार एवं भूख का प्रश्न इत्यादि सभी कुछ पर इस तरह के प्रयास चल रहे हैं जो सरकार की उपेक्षा या उसकी समझ के कारण उसकी प्राथमिकता में नहीं हैं लेकिन जैसी लोकप्रियता भ्रष्टाचार विरोधी और लोकपाल गठित करने की मांग करने वाले अन्ना हजारे के आन्दोलन को मिली वैसी किसी को नहीं। अपनी व्यापकता और प्रभाव में यह एक अखिल भारतीय आन्दोलन था। संसद और राजनीतिक दलों को लगभग नौ महीने तक जितना इसने उलझाये रखा उतना किसी और आन्दोलन ने नहीं किया। इस आन्दोलन ने इस तरह की संसदेतर लोकतांत्रिक राजनीति की नयी संभावनाओं के द्वार खोले हैं।

कभी इसे जन आन्दोलन का नाम दिया जाता है तो कभी इसे समाज कर्म का लेकिन यह सब एक खास तरह की राजनीति है जो अपने आप में क्रांतिकारी नहीं होते हुए भी सुधारवादी है, हालात में परिवर्तन की हामी है। इसका तेवर लोकतांत्रिक है, इसमें सरकारी राजनीति की तुलना में संवेदनशीलता, प्रतिबद्धता और ईमानदारी अधिक है इसलिए मध्यवर्ग को यह राजनीति अधिक विश्वसनीय लगती है। कुछ असंभव नहीं कि राजनीतिक दलों से थके और निराश मध्यवर्ग अपने लिए इसे और अधिक संगठित करे, संवारे और सरकारों के लिए मनमानी मुश्किल कर दे। उन लोगों के लिए नया मंच बन जाय जो लोग राजनीति तो करना चाहते हैं लेकिन उतना पतित होने को तैयार नहीं हैं जितना नैतिक पतन राजनीति में कामयाब होने के लिए जरूरी हो गई है। एक नये तरह के नेता बनने का मौका ये आन्दोलन देते हैं। मेधा पाटकर, अरूणा राय, अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल इत्यादि के नाम किस नेता से कम लोकप्रिय हैं या किस नेता की तुलना में इनका स्टार वैल्यू कम है?

संसद को जिस तरह से इस आन्दोलन ने लोकपाल विधेयक पास करने के लिए बाध्य किया और अपनी शक्ति से निर्देशित किया उससे कुछ सांसद, नेता और बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि यह संसदीय राजनीति को समाप्त करने वाला आन्दोलन है। कुछ लोग और आगे गये, खासतौर पर दलितों का एक हिस्सा जो यह प्रचारित करने लगा कि यह बाबा साहेब के संविधान को नष्ट करने का षड्यंत्र है। लालू प्रसाद यादव ने कहा कि ये लोग- टीम अन्ना- तानाशाह हैं और संसद पर ताला लगा देना चाहते हैं। प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में यह आन्दोलन संसदीय राजनीति को समाप्त करना चाहता है या लोकतंत्र को समाप्त करने के षड्यंत्र का हिस्सा है? कुछ की नजर में अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र। हां, इन चेहरों को चमकाने में अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का योगदान अधिक है, इन्हें सेलिब्रेटी के रूप में पहचान भी पश्चिम या अमेरिका ने सुरस्कृत-सम्मानित करके दी। इनके काम से किसी को इन्कार नहीं इसलिए किसी अंतर्राष्ट्रीय इशारे से भी कोई सहज इंकार नहीं कर सकता। लेकिन इस तरह की राजनीति या आन्दोलन के सामाजिक आधार और वर्गीय चरित्र को देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि ये असंसदीय या लोकतंत्र विरोधी हैं। जिस सामाजिक तबके का समर्थन इसे सबसे अधिक था उसमें मध्यवर्ग और मीडिया को सबसे आगे रखा जा सकता है। फिर भी विविध जातियों और वर्गों, सामाजिक समूहों की सहानुभूति और समर्थन इस आन्दोलन को मिला है। इस आन्दोलन का सामाजिक आधार इतना विविध और संश्लिष्ट है, अंतविर्रोधी भी, कि यह किसी तरह के लोकतंत्र विरोधी होने की संभावना को संजो ही नहीं सकता- चाह कर भी।

यह उल्लेखनीय है कि अपने उद्देश्य और चरित्र में यह आन्दोलन न केवल संसदीय आन्दोलन है बल्कि संसदीय राजनीति का पूरक भी है. भ्रष्टाचार के दीमक और घुन से मुक्त कर संसदीय राजनीति को फिर से चमकाने और धार देना ही जाने या अनजाने इस आन्दोलन का चरित्र और नियति है, शायद नीयत भी. निजी तौर पर भी इस आन्दोलन के संगठनकर्त्ता और नेता आमूल व्यवस्था-विरोधी या क्रान्तिकारी नहीं हैं, जैसे माओवादी-नक्सलवादी होते हैं या फिर दक्षिणपंथी-फासीवादी. अन्ना हजारे सेना में थे तो किरण बेदी और अरविन्द केजरीवाल राज्य का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं, पुलिस और अफसरशाही में बड़े पदों पर रहे हैं. शांति भूषण केंद्र में मंत्री रहे और वकालत करते हैं. उनके बेटे प्रशांत भूषण भी भारतीय दंड संहिता का व्यापार करते हैं. कुलमिलाकर कहा जाय तो ये सब-के-सब व्यवस्था का अंग हैं या रहे हैं. इसी तरह मुख्यधारा के सिविल सोसाइटी के अधिकांश संगठनों का व्यवस्था से सम्बन्ध है या रहा है. ऐसे आंदोलनों का नुकसान तात्कालिक रूप से किसी भी राजनीतिक दल को हो या सभी दलों का हो क्योंकि कोई नया दल अस्तित्त्व में आ जाय. किन दीर्घकालिक फायदा संसदीय प्रणाली का ही होता है या होगा. शायद इसी कारण कुछ माओवादी और व्यवस्था विरोधी इस आन्दोलन का विरोध कर रहे हैं क्योंकि ऐसे आन्दोलन व्यवस्था की सड़न को दूर करते हैं और ताजगी प्रदान करते हैं, जिससे वह दीर्घजीवी हो उठती है.

सरकारों और राजनीतिक दलों ने गैरसरकारी संगठनों और सिविल सोसाइटी के सदस्यों को अपनी तरह से स्वीकृति और वैधता दी है। पिछले दो दशकों में सिविल सोसाइटी की हैसियत, ताकत और लोकप्रियता को बढ़ाने में सरकार और मुख्यधारा दलों का सकारात्मक-नकारात्मक सहयोग भी काफी हद तक जिम्मेदार रहा है। इसका प्रमाण यह है कि पिछली यूपीए सरकार जिन उपलब्धियों को लेकर गौरवन्वित महसूस करती थी और जो उसके दुबारा चुने जाने में मददगार बनीं उनमें से कई सिविल सोसाइटी के आंदोलनों और मांगों की उपज थींण् सूचना का अधिकार ;अरुणा रॉयद्धए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ;ज्यां द्रेज़द्धए फरह नकवी और हर्ष मंदर सांप्रदायिक हिंसा ;रोकथामए नियंत्रण और पीड़ितों के पुनर्वासद्ध विधेयक इत्यादि का नाम लिया जा सकता हैण् सिविल सोसाइटी को अगर कार्पोरेट सेक्टर के बरक्स देखा जाय तो इसकी वास्तविक शक्ति का पता चलेगाण् आज सरकार को एक तरफ कार्पोरेट सेक्टर की बातें और मांगें मनानी पड़ रही है तो दूसरी तरफ सिविल सोसाइटी कीण् राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की भूमिका कस बरक्स सरकार के तमाम सलाहकार और पदाधिकारियों के बारे में यही बात लागू होती हैण् प्रधानमंत्री समेत मोंटेक सिंह अहलूवालिया और पी चिदंबरम, कौशिक बासु, नंदन निलेकनी आदि कार्पोरेट सेक्टर के हिमायती हैं तो सलाहकार परिषद सिविल सोसाइटी के कार्यकर्र्ताओं के कारण जनता की या वैकल्पिक नीतियों की हिमायती है. एक तरह से इसे कार्पोरेट सेक्टर और सिविल सोसाइटी के बीच संतुलन बनाने का माध्यम भी माना जा सकता है और प्रकारांतर से पूंजीवादी नीतियों और जनवादी नीतियों के बीच भीण् सरकार क्यों अपनी कल्पना शक्ति में इतनी कमजोर हो गयी है कि वह बस मुहर लगाने वाली संस्था हो गयी है. संसद के बारे में भी यही सही हैण् इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो अर्द्ध औपनिवेशिक स्थिति में नव साम्राज्यवाद और उदारीकरण की नीतियों ने जहाँ सरकार की हैसियत को दोयम दर्जे का बना दिया और उसे लगभग जनविरोधी बना दिया है तो सरकारों की सामाजिक और वैचारिक भूमिका को सिविल सोसाइटी ने अपने हाथ में लिया है.
प्रश्न यह उठता है कि सिविल सोसाइटी की बढ़ती शक्ति और लोकप्रियता का राज क्या है? सबसे महत्वपूर्ण बात तो यही कि राजनीतिक पतन ने इसके लिए रास्ता तैयार किया. संसदीय लोकतंत्र पार्टियों की आंतरिक राजनीति का दर्पण होता है. बेहतर राजनीतिक दलों के बिना संसदीय राजनीति सफल नहीं हो सकती. आज का संकट दलों के राजीतिक स्तर का प्रतिफल है. राजनीतिक दलों की कार्य-प्रणाली ऐसी हो गयी जिसमें वैचारिक, सज्जन और नैतिक लोगों के लिए जगह ही नहीं रह गयी. पार्टियों में जाति, धर्म और धन-बल,बाहु-बल के आधार पर जगह बनने लगी. कार्पोरेट जगत ने अपने लिए काम करने वाले नेताओं को चिन्हित कर लिया. नेताओं में कार्पोरेट जगत के सबसे करीबी होने की स्पर्द्धा होने लगी. ऐसे में जो व्यक्ति सैद्धांतिक लाइन लेने वाले थेए कार्पोरेट के हाथ बिकने और मतदाताओं को खरीदने की हद तक नहीं गिर सकते थे, उनके लिए दलों में कोई जगह नहीं बची. राजनीति में विचारधारा और सिद्धांत का अंत हो गया. अवसरवाद एकमात्र सिद्धांत और पूंजीवाद एकमात्र विचारधारा हो गयी. ऐसे परिवेश में जो लोग कुछ अलग करना चाहते थे उनके लिए एक मात्र रास्ता बचाए गैर सरकारी संगठन बनाकर काम करो. आज जनांदोलन राजनीतिक दल नहीं, ये संगठन कर रहे हैं. राजनीतिक दलों ने ऐसे लोगों को साथ रखने की योग्यता दिखाई होती तो सिविल सोसाइटी के बहुत सारे चेहरे उनके साथ होते! आखिर उनको संसदीय लोकतंत्र से कोई सैद्धांतिक दिक्कत तो है नहीं.

अन्ना हजारे के आन्दोलन की विचारधारा की बात करें तो यह स्पष्ट होगा कि इसकी कोई संगठित विचारधारा नहीं है। राष्ट्रीय प्रतीकों और गांधीवाद के ’रेटॉरिक’ के आवरण में यह कुछ व्यक्तियों का एक राष्ट्रीय समस्या के निदान के लिए सामूहिक सहयोग अधिक है। इस आन्दोलन के नेता यह कहते रहे कि वे राजनीति से दूर हैं लेकिन वे राजनीति से दूर न होकर मोट-मोटी दलीय राजनीति से दूर जरूर हैं। एक अर्थ में वे जरूर अराजनीतिक हैं। वह अर्थ है एक खास विचारधारा के आधार पर संगठित न होने का। यह अराजनीतिक होती भारतीय राजनीति परिदृष्य का एक और रोचक उदाहरण पेश करती है जिसमें विचारधारा से अधिक विचार महत्वूपर्ण होते हैं और सामान्य कारण के लिए लोग इकट्ठे होते हैं। लेकिन पूंजीवाद के प्रति इनका क्या दृष्टिकोण है? कुछ साफ नहीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि मुख्यधारा के राजनीतिक दलों की तरह यह भी तरह तरह के कॉस्मेटिक मुद्दों की राजनीति में उलझा है और पूंजीवाद के खिलाफ कोई संकट बनने से बचना चाहता है। वरना किसको मालुम नहीं कि इतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के लिए औपनिवेशिक विरासत और अंतर्राष्ट्रीय पूंजीवाद और भारत की नव आर्थिक नीतियां ही जिम्मेदार हैं और किसी एक संस्था और विधान के निर्माण से भ्रष्टाचार को नहीं मिटाया जा सकता है। अगर वे पूंजीवाद के खिलाफ उठना चाहते तो भ्रष्टाचार विरोध की तार्किक परिणति अनिवार्यतः नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के विरोध में होती। सिर्फ एक लोकपाल के गठन में निश्चय ही नहीं। अब हो सकता है कि राजनीतिक दल या नेता घूस न लें और मुफ्त में भ्रष्टाचार करें और पूंजीपतियों को लाबिइंग का खर्च भी न देना पड़े। अफसरशाही और व्यवस्था में जो घूसखोरी और दलाली की संरचनात्मक पंरपरा है उसके समाप्त होने की संभावना तो नहीं लगती।

सिविल सोसाइटी आन्दोलन की जीत-हार और शक्ति-सीमा को इस परिप्रेक्ष्य में देखने पर यह स्पष्ट होता है कि इस देश में आने वाले दिनों में संसदेतर राजनीति और अधिक सुदृढ़ होगी और जनता को यह आश्वासन रहेगा कि वह विकल्पहीन नहीं है, उसके पास विकल्प हैं। बावजूद इसके कि यह विकल्प भी उन ताकतों के हाथों का खिलौना जरूर बना रहेगा जिनके हाथों में दुनिया भर की संसदीय राजनीति बंजर हो गई है और संसदीय राजनीति के बारे में महात्मा गांधी की मान्यताओं को सही साबित कर दिया है।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

डर्टी पिक्चर : देह से मुक्ति का राग




डर्टी पिक्चर : देह से मुक्ति का राग
डॉ आनंद पाण्डेय





स्त्री मुक्ति का सपना आज भी मानव-समाज के लिए एक चुनौती है. फिल्म, साहित्य, राजनीति और कलाओं में विभिन्न रूपों में स्त्री मुक्ति की तड़प और प्रयास दिखाई देते हैं.खासतौर पर जब किसी कथा, कला, या फिल्म की रचना के केंद्र में स्त्री का चरित्र हो तब स्त्री-मुक्ति के संदर्भ में उसकी सफलता-असफलता का मूल्यांकन किया जाता है. सहज ही स्त्री मुक्ति का प्रश्न उसके मूल्यांकन की एक केन्द्रीय कसौटी हो जाता है. मिलन लूथरिया की हालिया फिल्म 'डर्टी पिक्चर' ने स्त्री मुक्ति के प्रश्न को आज के सामान्य पढ़े-लिखे तबके से लेकर गंभीर बुद्धिजीवियों के बीच में फिर से उठा दिया है.

सामान्य दर्शक जो किसी फिल्म को सिर्फ मनोरंजन के लिए देखता है, उसके लिए यह फिल्म एक मसाला फिल्म है. जिसमें जीरो साइज़ की बालीवुड नायिकाओं से ऊबे दर्शक को दक्षिण की फिल्मों की मांसल देह यष्टि वाली नायिका के दर्शन होते हैं और जो उसे खूब भाई भी है. लेकिन एक वर्ग है जो पॉपुलर कल्चर को बौद्धिक विषय बनाकर उसे विचारधारा या सामाजिक सरोकारों के आधार पर देखता-परखता है. इस वर्ग का एक हिस्सा इस फिल्म को वैसे ही ख़ारिज करता है जैसे फिल्म का एक नायक इब्राहीम (इमरान हाशमी) करता है. तो दूसरा हिस्सा फिल्म को नारी-मुक्ति के लिए प्रतिबद्ध फिल्म की तरह से लेता है. और उसे देह पर अधिकार के माध्यम से नारी मुक्ति की समर्थक फिल्म मानता है. हमें ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली है कि फ़िल्मकार ने कोई प्रतिबद्ध फिल्म बनाने के मकसद से यह फिल्म बनायी है. फिल्म की एक महिला पत्रकार की सिल्क के चरित्र और व्यक्तित्व पर की गयी सकारात्मक टिप्पणियों के आलावा इस वर्ग के लोगों के पास स्त्री- विमर्श की वह देह-केन्द्रित मान्यता भी तर्काधार के रूप में मौजूद है जिसके अनुसार स्त्री के देह पर पुरुष का अधिकार है, अगर स्त्री अपने शरीर पर दावा करती है तो यह एक मुक्तिकामी प्रयास है.

हाँ, यह सही है कि जब स्त्री अपने देह पर अपना अधिकार दिखाती है तो वह उस पर पुरुष के आधिपत्य को चुनौती देती है. स्त्री विमर्श में भी स्त्री की लैंगिकता और देह को अपने इच्छानुसार इश्तेमाल करने को उसकी मुक्ति का एक रास्ता माना गया है. इन बातों से यहाँ इंकार की बजाय यह स्थापित करने कि कोशिश की जा रही है कि इस मान्यता की सीमायें स्पष्ट हैं और अनुभव यह बताता है कि इससे स्त्री की मुक्ति संभव नहीं है. मुक्ति की स्थिति उद्देश्य की पूर्णता है. देह मुक्ति से स्त्री मुक्ति नहीं हो सकती. मुक्ति के लिए चेतना की मुक्ति अनिवार्य शर्त है. देह की मुक्ति आरंभिक अवस्था या एक लक्षण है. उद्देश्य की पूर्णता की अवस्था नहीं. बल्कि इससे वह कई ऐसी समस्याओं से घिर जाती है जो उसे और अधिक विवश और पुरुष के लिए सहज लभ्य बना देती हैं. 'डर्टी पिक्चर' की सिल्क एक ऐसी ही लड़की है. 'डर्टी पिक्चर' स्त्री को, अगर वह ऐसा करने का दावा करती है तो, ऐसी ही मुक्ति को सुझाती है जो उसे और नयीं समस्याओं में डाल देती है. और नायिका दुरूपयोग को विवश हो जाती है और अपराधबोध में आत्महत्या कर लेती. यही मुक्ति के शरीरधर्मी प्रयासों की त्रासदी है. यही सिल्क की त्रासदी है.

मुक्ति के इस तरह के देहधर्म-केन्द्रित विमर्श की विडंबना को उजागर करने के लिए सिल्क का चरित्र बहुत मौजू है. वह प्रेम-आकर्षण से फिल्म में आती है, देह के बल पर आगे बढती है, प्रतिशोध में तबाह होती है और इस्तेमाल हो जाने के अपराधबोध से मर जाती है. जहाँ सिल्क का अंत होता है वहां से स्त्री मुक्ति का कौन-सा चरण शुरू होता है? वह आत्महत्या करती है लेकिन उसकी आत्महत्या शहादत नहीं है जो बदलाव की प्रेरणा पैदा करने में सक्षम होती है. वह अँधेरे में आत्महत्या करती है, अकेलेपन में. अगर उसने पुरूषवाद के लिए कोई तार्किक चुनौती पेश की होती तो समाज उस पर पिल पड़ता. तब शायद उसकी हत्या हो जाती या तसलीमा की तरह देश निकाला दे दिया गया होता. सिल्क की त्रासदी देह-केन्द्रित स्त्री मुक्ति के विमर्श की त्रासदी है. ऐसे विमर्श को बढ़ावा देने की बजाय यह फिल्म उसकी निरर्थकता को प्रमाणित करती है. ऐसे विमर्श की विडम्बना को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करती है. इस नजरिये से देखें तो यह एक सफल फिल्म है और सार्थक भी. प्रतिबद्ध भी और सामाजिक भी.

सिल्क में मुक्ति की व्यवस्थित चेतना का अभाव है. यह क्या, उसमें मुक्ति की लालसा का भी अभाव है. क्या उसमें विद्रोह-भावना है? वह अपने फ़िल्मी कैरियर में कामयाब होने के लिए स्त्रीत्व के सम्रग्र आख्यान की बजाय, उसके बाजारू रूप का सहारा लेती है. वह वही करती है जो फ़िल्मी दुनिया के बारे में 'कास्टिंग काउच' के नाम से ज्यादा जाना जाता है . पुरुष स्टार के प्रति उसके मन में प्रतिशोध भी कोई सामाजिक आयाम नहीं ग्रहण करता बल्कि एक प्रेमिका के सामाजिक अधिकार से वंचित होने का प्रतिशोध है. वह स्टार के प्रति बचपन से आकर्षण अनुभव करती थी, वह उसे अपना सब कुछ दे देती है लेकिन स्टार यही समझता रहा की यह लड़की भी उन कई लड़कियों की तरह ही है जो अपने शरीर के बल पर धन-दौलत और स्टार बनना चाहती हैं. लेकिन वह एक प्रेमिका का अधिकार चाहती है. नहीं मिलने पर बगावत कर बैठती है और उसे बर्बाद करने की कोई भी प्रविधि इश्तेमाल करती है. इसमें वह कहाँ स्त्री मुक्ति की भावना से लैश रहती है? या उस भावना को आगे बढ़ाती है?

जो लोग यह मानते हैं की 'डर्टी पिक्चर' शरीर के माध्यम से मुक्ति का प्रयास है उहें यह देखना चाहिए कि फिल्म उनकी इस बात का समर्थन करने की बजाय इसका खंडन करती है. शरीर केन्द्रित मुक्ति का प्रयास जहाँ औरत को समस्याओं में उलझाकर उस बर्बाद कर देता है वहीँ उसका वस्तुकरण भी कर देता है. जहाँ स्त्री बाजार के एक उत्पाद की तरह है. दुनिया की क्रय शक्ति का अधिकांश पुरुषों के पास ही तो है. जब वे उसे बंधक बनाकर नहीं रख पाएंगे तो खरीद लेंगे. चाहे उस फिल्मों में गरम सीन देने वाली अभिनेत्री के रूप में या विश्व सुंदरी के रूप में या एक सेक्स वर्कर के रूप में. इस वस्तुकरण से बचना स्त्री के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि यह उसके अमानवीकरण का आकर्षक माध्यम भी है, जिसे बाजार एक षड़यंत्र की भांति रचता है. यह फिल्म शरीर धर्मी मुक्ति-विमर्श की विडंबना को उजागर करती है.
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रविवार, 30 अक्टूबर 2011

ऐ चकोर!

उड़ो-उड़ो उन्मुक्त
चन्द्र को अपने छोड़
ऐ चकोर!
गगन के छोर-छोर.
तुम पंछी, पंख तुम्हारे
मुक्त बनो! तज अंक हमारे
हम निश्छल पंख विहीन
दाग-धब्बे युक्त दीन.
तुम सक्षम जीव, धरो रूप नित नवीन
हम निर्जीव, पर सुनो! नहीं हृदयहीन.
तुम उड़ो-उड़ो मुक्त
पर मैं नहीं अभियुक्त
ऐ, चकोर!

शनिवार, 24 सितंबर 2011

संसदीय राजनीति और नागरिक समाज

संसदीय राजनीति और नागरिक समाज

-आनंद पांडेय

आजकल भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ने संसदीय राजनीति के पतन को उघाड़ने और सरकार की उपस्थिति को एक शोक गीत के रूप में प्रतीकित कर दिया है. अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले इस आन्दोलन को व्यापक लोकप्रियता मिली है और इस आन्दोलन की शक्ति और संभावनाएं अभी भी बनी हुई हैं. इस आन्दोलन का वैचारिक विरोध भी हो रहा है. समाज के अलग-अलग वैचारिक और जातीय वर्गों की तरफ से. कोई इसे प्रतिक्रांतिकारी कह रहा है तो कोई इसे सवर्ण-हिंदूवादी. इसके साथ ही साथ अन्ना के अतिरिक्त संगठन कर्यकर्ताओं पर भी तरह-तरह से उंगलियाँ उठ रही हैं. लेकिन असल में इस आन्दोलन और इसके पहले के सारे जनांदोलन बुनियादी रूप से पतित हो चुकी संसदीय राजनीति पर अब सीधे-सीध उंगली उठा रहे हैं.

जो लोग यह सोचते थे कि जनता अब केवल राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के हाथों बंधक हो गयी है और उसे केवल खरीदा, धमकाया और भटकाया जा सकता है, उन्हें भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन एक पहेली लग रहा है. इस आन्दोलन का महत्व इसी बात में है कि इसने पूरे राजनीतिक वातावरण के लिए एक ताज़ा हवा का झोंका की तरह से काम किया है. अन्ना द्वारा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक पर बहस का विकल्प खुला हुआ है और उनकी बातों से सहमति और असहमति दोनों स्वाभाविक हैं. यह उल्लेखनीय है कि, अपने उद्देश्य और चरित्र में यह आन्दोलन न केवल संसदीय आन्दोलन है बल्कि संसदीय राजनीति का पूरक भी है. भ्रष्टाचार के दीमक और घुन से मुक्त कर संसदीय राजनीति को फिर से चमकाने और धार देना ही जाने या अनजाने इस आन्दोलन का चरित्र और नियति है, शायद नीयत भी. निजी तौर पर भी इस आन्दोलन के संगठन कर्त्ता और नेता आमूल व्यवस्था-विरोधी या 'क्रांतिकारी' नहीं हैं. जैसे माओवादी-नक्सलवादी होते हैं या फिर दक्षिणपंथी-फासीवादी. अन्ना हजारे सेना में थे तो किरण बेदी और अरविन्द केजरीवाल राज्य का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं, पुलिस और अफसरशाही, में बड़े पदों पर रहे हैं. शांति भूषण केंद्र में मंत्री रहे और वकालत करते हैं. उनके बेटे प्रशांत भूषण भी भारतीय दंड संहिता का व्यापार करते हैं. कुलमिलाकर खा जाय तो ये सब-के-सब व्यवस्था का अंग हैं या रहे हैं. इसी तरह मुख्यधारा के सिविल सोसाइटी के अधिकांश संगठनों का व्यवस्था से सम्बन्ध है या रहा है. ऐसे आंदोलनों का नुकसान तात्कालिक रूप से किसी भी राजनीतिक दल को हो या सभी दलों का हो क्योंकि कोई नया दल अस्तित्त्व में आ जाय.लेकिन दीर्घकालिक फायदा संसदीय प्रणाली का ही होता है या होगा. शायद इसी कारण कुछ माओवादी और व्यवस्था विरोधी इस आन्दोलन का विरोध कर रहे हैं. क्योंकि ऐसे आन्दोलन व्यवस्था की सडन को दूर करते हैं और ताजगी प्रदान करते हैं, जिससे वह दीर्घजीवी हो उठती है. पिछले करीब दो दशकों में सिविल सोसाइटी की हैसियत, ताकत और लोकप्रियता बढ़ी है. इसका प्रमाण यह है कि पिछली यूपीए सरकार जिन उपलब्धियों को लेकर गौरवन्वित महसूस करती थी और जो उसके दुबारा चुने जाने में मददगार बनीं उनमें से कई सिविल सोसाइटी के आंदोलनों और मांगों की उपज थीं. सूचना का अधिकार (अरुणा रॉय), राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (ज्यां द्रेज़), फरह नकवी और हर्ष मंदर सांप्रदायिक हिंसा (रोकथाम, नियंत्रण और पीड़ितों के पुनर्वास) विधेयक इत्यादि का नाम लिया जा सकता है. सिविल सोसाइटी को अगर कार्पोरेट सेक्टर के बरक्स देखा जाय तो इसकी वास्तविक शक्ति का पता चलेगा. आज सरकार को एक तरफ कार्पोरेट सेक्टर की बातें और मांगें मनानी पड़ रही है तो दूसरी तरफ सिविल सोसाइटी की. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की भूमिका कस बरक्स सरकार के तमाम सलाहकार और पदाधिकारियों के बारे में यही बात लागू होती है. प्रधानमंत्री समेत मोंटेक सिंह अहलूवालिया और पी चिदंबरम, कौशिक बासु, नंदन निलेकनी आदि कार्पोरेट सेक्टर के हिमायती हैं तो सलाहकार परिषद सिविल सोसाइटी के कार्य कर्र्ताओं के कारण जनता की या वैकल्पिक नीतियों की हिमायती है. एक तरह से इसे कार्पोरेट सेक्टर और सिविल सोसाइटी के बीच संतुलन बनाने का माध्यम भी माना जा सकता है और प्रकारांतर से पूंजीवादी नीतियों और जनवादी नीतियों के बीच भी. सरकार क्यों अपनी कल्पना शक्ति में इतनी कमजोर हो गयी है कि वह बस मुहर लगाने वाली संस्था हो गयी है. संसद के बारे में भी यही सही है. इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो अर्द्ध औपनिवेशिक स्थिति में नव साम्राज्यवाद और उदारीकरण की नीतियों ने जहाँ सरकार की हैसियत को दोयम दर्जे का बना दिया और उसे लगभग जनविरोधी बना दिया है तो सरकारों की सामाजिक और वैचारिक भूमिका को सिविल सोसाइटी ने अपने हाथ में लिया है. प्रश्न यह उठता है कि सिविल सोसाइटी की बढ़ती शक्ति और लोकप्रियता का राज क्या है? सबसे महत्वपूर्ण बात तो यही कि राजनीतिक पतन ने इसके लिए रास्ता तैयार किया.संसदीय लोकतंत्र पार्टियों की आंतरिक राजनीति का दर्पण होता है. बेहतर राजनीतिक दलों के संसदीय राजनीति सफल नहीं हो सकती. आज का संकट दलों के राजीतिक स्तर का प्रतिफल है.राजनीतिक दलों की कार्य प्रणाली ऐसी हो गयी जिसमें वैचारिक, सज्जन और नैतिक लोगों के लिए जगह ही नहीं रह गयी. पार्टियों में जाति, धर्म और धन-बल, बाहु-बल के आधार पर जगह बनने लगी. कार्पोरेट जगत ने अपने लिए काम करने वाले नेताओं को चिन्हित कर लिया. नेताओं में कार्पोरेट जगत के सबसे करीबी होने की स्पर्द्धा होने लगी. ऐसे में जो व्यक्ति सैद्धांतिक लाइन लेने वाले थे, कार्पोरेट के हाथ बिकने और मतदाताओं को खरीदने की हद तक नहीं गिर सकते थे, उनके लिए दलों में कोई जगह नहीं बची. राजनीति में विचारधारा और सिद्धांत का अंत हो गया. अवसरवाद एकमात्र सिद्धांत और पूंजीवाद एकमात्र विचारधारा हो गयी. ऐसे परिवेश में जो लोग कुछ अलग करना चाहते थे उनके लिए एक मात्र रास्ता बचा, गैर सरकारी संगठन बनाकर काम करो. आज जनांदोलन राजनीतिक दल नहीं, ये संगठन कर रहे हैं. राजनीतिक दलों ने ऐसे लोगों को साथ रखने की योग्यता दिखाई होती तो सिविल सोसाइटी के बहुत सारे चेहरे उनके साथ होते! आखिर उनको संसदीय लोकतंत्र से कोई सैद्धांतिक दिक्कत तो है नहीं.

अगर हम भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के सन्दर्भ में दलीय राजनीति की राजनीतिक समझदारी और लोकतान्त्रिक संवेदनशीलता को परखें तो वह मूर्खतापूर्ण और राजनीतिक विवेक से शून्य हो गयी है. सरकार ने वह सब कुछ किया जो उसे करना चाहिए था लेकिन सब कुछ खोकर, अपनी इच्छा से नहीं जन-दबाव में आकर. पूरे समय एक राजनीतिक नेतृत्व की कमी खलती रही. इस विवेक शून्यता का कांग्रेस को ही भुगतना होगा, प्रकारांतर से उसने संसदीय प्रक्रिया की भी साख को काम किया. आन्दोलन ने प्रश्नों को अनजाने ही उठा दिया है उनमें से दलीय राजनीति का प्रश्न भी है. उसने दलीय राजनीति में सुधार और उसके स्तर को और अधिक ऊँचा उठाने की जरूरत को रेखांकित किया है. अब देखना है कि राजनीतिक दल इससे कितनी सीख लेते हैं. इस सीख पर ही न केवल संसदीय राजनीति का भविष्य निर्धारित होगा बल्कि सिविल सोसाइटी कि भूमिका और जगह भी तय होगी.

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

योगी आदित्यनाथ की ‘राजनीति’

योगी आदित्यनाथ की ‘राजनीति’

गोरखपुर (उ. प्र.) के सांसद आदित्यनाथ की सांप्रदायिक राजनीति का जायज़ा ले रहे हैं आनंद पांडे. श्री पांडे राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और जेएनयू में शोध छात्र हैं.

योगी आदित्यनाथ (pic: http://www.yogiadityanath.co.in/)

पिछले कुछ सालों से पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और उसके आस-पास के जिलों में हिन्दू सांप्रदायिक राजनीति एक नए प्रकार के प्रयोग के दौर से गुजर रही है. जाति, धर्म, अपराध और साम्प्रदायिकता के मिश्रण की इस राजनीति के नेता हैं गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मठ के उत्तराधिकारी तथाकथित ‘बाबा’ योगी आदित्यनाथ. यों तो आदित्यनाथ भाजपा के टिकट पर गोरखपुर से निर्वाचित सांसद हैं लेकिन इस क्षेत्र में वे भाजपा के एजेंडे पर नहीं बल्कि अपने एजेंडे पर चलते हैं.

यह एजेंडा है तो हिंदुत्व का ही लेकिन मठ के पूर्ववर्ती नेताओं के विपरीत आदित्य नाथ की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और उनके आक्रामक स्वाभाव ने इसे नयी धार दी है. यह धार है हिंदुत्व की राजनीति को और अधिक जहरीली और आक्रामक बनाने वाली. गोरखपुर और उसके आस -पास के जिलों में छोटे-छोटे सामान्य झगड़ों और आपराधिक मसलों को सांप्रदायिक रंग देकर आदित्य नाथ ने समाज को अभूतपूर्व रूप से विभाजित और हिंसाग्रस्त किया है.

आदित्यनाथ भाजपा के टिकट पर सिर्फ चुनाव लड़ते हैं और उसके सांगठनिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करते हैं तथा उसके पदों पर अपने समर्थकों को बैठाते हैं लेकिन अपनी गतिविधियों को वे स्वतंत्र रूप से गोरख नाथ मठ के उत्तराधिकारी के रूप में हिन्दू युवा वाहिनी और हिन्दू महासभा के बैनर तले चलाते हैं. आदित्यनाथ हिन्दू युवा वाहिनी के संरक्षक हैं. इसके अलावा हिन्दू जागरण मंच, केसरिया सेना, केसरिया वाहिनी, कृष्ण सेना आदि अनेक ऐसे संगठन हैं जो उनके अग्रिम संगठन के रूप में काम करते हैं. और भी कई संगठन हैं जो समाज के अलग-अलग वर्गों को संगठित करने के क्रम में तैयार किये गए हैं, जैसे फुटपाथ पर गुजारा करने वालों को ‘ राम प्रकोष्ठ’ के अंतर्गत और जो लकड़ी या बांस का काम करते हैं उन्हें ‘बांसफोड़ हिन्दू मंच’ के बैनर तले संगठित किया जाता है. जाहिर है कि, इस तरह के जन संगठन बनाने की प्रेरणा उन्होंने आरएसएस से ली है. इनकी विचारधारा और राजनीतिक एजेंडा भी वही है जो आरएसएस का है लेकिन एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा कैसे एक बड़े एजेंडे को अपनी शैली से प्रभावित करती है और उसमें अपनी जगह बनाती है, आदित्य नाथ की राजनीति इसी दास्ताँ को बयाँ करती है.

आज देखते हैं तो अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि आदित्य नाथ और उनके कुछ पूर्वजों ने एक प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष साधना-संप्रदाय को पथभ्रष्ट और पतित करके सवर्णवादी हिन्दू सांप्रदायिक और क्षेत्रीय फासीवादी राजनीतिक संगठन में बदल दिया है. आदित्य नाथ की असली ताकत और पूँजी है ‘धर्म’ और उसका आश्रय स्थल है गोरखनाथ मठ. मठ की धार्मिक साख और आर्थिक पूँजी इतनी अधिक है कि उसके आधार पर उस क्षेत्र में बड़े – से -बड़ा सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन किया जा सकता है. गोरख नाथ मंदिर की हिन्दू जनता में बड़ी प्रतिष्ठा है, इसके मुख्य पुजारी और महंत होने से उनकी भी प्रतिष्ठा वैसी ही है. उनकी दूसरी सबसे बड़ी ताकत है हिंदुत्व का एजेंडा और भाजपा. इस मठ का हिंदूवादी राजनीतिक संगठन हिन्दू महासभा से सम्बन्ध आजादी से पहले से चला आ रहा है. १९५२ में संपन्न हुए पहले आम चुनावों से लेकर अब तक के चुनावों में इस मठ के प्रतिनिधि कुछेक बार को छोड़कर हमेशा लड़ते रहे हैं. तत्कालीन महंत दिग्विजय नाथ ने १९५२, १९६२ का चुनाव लड़ा किन्तु उन्हें पहली जीत १९६७ के चुनावों में मिली. महंत अवैद्य नाथ ने चुनाव लड़ा था. इसके बाद १९८९ और १९९१ में वे लड़े और जीते भी. मठ के तीसरी पीढ़ी के नेता १९९६, १९९८, १९९९ , २००४ और २००९ के चुनाव लड़ते और जीतते आ रहे हैं. गोरखपुर सीट के चुनावी इतिहास को देखने पर यह स्पष्ट होता है कि मठ की राजनीतिक साख तभी बढ़ी जब उसने भाजपा के साथ अपने आपको जोड़ा.

योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक अंदाज़ बाल ठाकरे और नरेन्द्र मोदी की तरह का है. उनकी हिदू युवा वाहिनी भारत की शिव सेना और जर्मनी के हिटलर की ‘स्टॉर्म ट्रुपर’ की पद्धति की है. यों तो योगी आदित्य नाथ इसे सांस्कृतिक संगठन कहते हैं लेकिन इस इलाके में इसकी छवि बेरोजगार और असामाजिक नौजवानों की टोली की है. ऐसे ही युवाओं को संगठित करके महाराष्ट्र में बाल ठाकरे ने शिव सेना को एक राजनीतिक ताकत बनाया. योगी ने भी बाल ठाकरे की तर्ज़ पर बेरोजगार और छोटे-मोटे अपराधियों को शामिल कर युवा वाहिनी का गठन किया है. बाल ठाकरे के पास धार्मिक ताकत नहीं थी जबकि योगी के पास धार्मिक साख है. इससे पूर्वांचल में सांप्रदायिक और फासीवादी राजनीति का खतरा बढ़ जाता है. वाहिनी योगी की राजनीतिक ताकत को आधार प्रदान करती है और राजनीतिक अपसंस्कृति को बढाती है. इसे सांस्कृतिक संगठन कहना सफेद झूट है. इस संगठन पर दंगे भड़काने के अनेक आरोप हैं. इस संगठन ने एक नारा चलाया है, ” उत्तर प्रदेश में रहना है, तो योगी-योगी कहना है.” यह नारा योगी आदित्य नाथ के व्यक्तित्व और उनकी राजनीति की आक्रामकता और आतंक को व्यक्त करता है.किसी जुलूस इत्यादि में इस नारे और ऐसे कई और नारों को लगाते हुए योगी समर्थक जब चलते हैं तो एक प्रकार की दहशत का माहौल बन जाता है.

नरेन्द्र मोदी और गुजरात का उनका सांप्रदायिक प्रयोग आदित्यनाथ को काफी आकर्षक लगता है तभी तो वे बार-बार विभिन्न क्षेत्रों को गुजरात बना देने की बातें करते हैं. गौतम बुद्ध की जन्म स्थली कुशी नगर के पडरौना में अल्पसंख्यकों को लूटने और उनका घर और धन लूटने-जलाने के बाद जो नारा लगा था उससे योगी की इस महत्वाकांक्षा का पता चलता है. नारा था-” उत्तर प्रदेश गुजरात बनेगा, पडरौना शुरुआत करेगा.” उत्तर प्रदेश जाति और धर्म की राजनीति के लिए कुख्यात हो गया है. बाबा धर्म के साथ -साथ जाति की भी राजनीति करते हैं, ठाकुर जाति के हैं और ठाकुरों की हर सही और गलत बात का समर्थन करते हैं. यही नहीं उनके लोग जातीय संघर्षों में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं.कोई साधु स्वभाव नेता जाति और धर्म की राजनीति नहीं कर सकता लेकिन बाबा करते हैं. अगर उन्हें भी साधारण नेताओं की तरह ही राजनीति करनी है तो जनता की धार्मिक आस्था का शोषण क्यों करते हैं.

जाहिर है, आदित्य नाथ की राजनीति वैचारिक गिरावट और सैद्धांतिक दिवालियेपन का प्रतीक है जो अपने समय की राजनीतिक और सांस्कृतिक बिडम्बना को उजागर करती है. नाथ सम्प्रदाय की परम्परा पर एक नजर डालने से यह बिडम्बना बोध और गहरा हो जाता है. नाथ संप्रदाय सामाजिक रूप से प्रगतिशील और समतावादी तथा धार्मिक रूप से समरस संप्रदाय था. एक ओर जहाँ वह वर्ण व्यवस्था विरोधी था वहीं दूसरी ओर वह सभी धर्मों के मानने वालों के लिए समान रूप से खुला था.अपने इसी स्वाभाव के कारण नाथ संप्रदाय निचली जातियों में अधिक लोकप्रिय था. १९२१ की जनगणना के अनुसार मुसलमान योगियों की संख्या ३११५८ थी जो नाथ पंथियों की कुल संख्या का करीब चालीस प्रतिशत थी. इसके साथ-साथ इस संप्रदाय का स्वरुप न केवल अखिल भारतीय था बल्कि अंतर्राष्ट्रीय भी था.

आज गोरखपुर एक शहर है जिसके मुहल्लों और बाज़ारों के नाम हिन्दूकरण किया जा रहा है. मियां बाज़ार का माया बाज़ार, अलीनगर का आर्य नगर, उर्दू बाज़ार का हिंदी बाज़ार के रूप में नामकरण किया जा गया है. हिन्दुओं ने इस नामकरण को तो आसानी से स्वीकार कर लिया लेकिन मुसलमानों ने नहीं स्वीकार किया है. फलस्वरूप एक ही बाज़ार का नाम हिन्दू दूकानदार ने हिंदी बाज़ार लिखा रखा है तो उसके पड़ोसी मुसलमान दूकानदार ने उर्दू बाज़ार. पहली नजर में यह दृश्य हास्यास्पद लगता है लेकिन जल्द ही यह ऐतिहासिकता के साथ एक खिलवाड़ और उससे भी अधिक किसी संस्कृति अथवा किसी दिल के टूटने की पीड़ा का एहसास करा देता है. इस बर्बादी के लिए दोषी है, आदित्य नाथ की जहरीली राजनीति.

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संघ को गुस्सा क्यों आता है?

संघ को गुस्सा क्यों आता है?

कॉंग्रेस महासचिव राहुल गांधी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सीमी को सामान रूप से साम्प्रदायिक बताये जाने से उपजे विवाद पर आनंद पांडे की टिप्पणी. श्री पांडे कॉंग्रेस के छात्र संगठन के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव रहे हैं और जेएनयू में शोधरत हैं. उनसे anandpandeymail@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

आनंद पांडे

कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश यात्रा के दौरान अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव राहुल गाँधी द्वारा आरएसएस की तुलना सिमी से करने पर समूचा संघ परिवार बौखला गया है. इस बौखलाहट की वजह यह है कि जिस सिमी का विरोध कर संघ परिवारी अपनी राष्ट्र भक्ति का रंग चोखा करते थे उसी सिमी से संघ की तुलना उसे अप्रत्याशित क्षति पहुंचा सकती है. भारत और दुनिया के अकादमिक जगत के लोग, नेता और पत्रकार सभी संघ की स्थापना से लेकर अब तक यह कहते रहे की संघ एक सांप्रदायिक,फासीवादी और भारतीय संविधान की भावना के विरुद्ध खड़ा संगठन है. आज भी संघ के इस घातक चरित्र पर किसी को संदेह नहीं है. समय-समय पर उसकी असलियत को उजागर करने वाले बयान और लेखन आते रहते हैं, बावजूद इसके संघ अपनी चाल में चलता रहता है. एक वैचारिक संवेदनहीनता और निष्ठुरता की प्रवृत्ति की वजह से वह इनसे अधिक घबराता भी नहीं है. लेकिन राहुल गाँधी के बयान के बाद संघ परिवार न केवल घबराया है बल्कि अन्दर तक हिल गया है. वजह यही हो सकती है कि संघ पर टिप्पणी करने वाला व्यक्ति कोई साधारण राजनेता नहीं बल्कि गाँधी-नेहरु परिवार के साथ- साथ कांग्रेस की सवा सौ साल पुरानी विरासत का वाहक और युवाओं में अत्यंत लोकप्रिय जुझारू नेता है. उनकी व्यक्तिगत और राजनीतिक साख देश-दुनिया में संघ परिवार से कई गुना अधिक है. इसीलिए यह टिप्पणी उसके लिए एक भारी हमले की तरह है जो युवाओं में उसकी लोकप्रियता को ख़त्म कर सकती है. और इसीलिए संघ गुस्से में है, संघ परिवारी न केवल सार्वजनिक तौर पर इसका अभद्र और अमर्यादित विरोध कर रहे हैं बल्कि मिलने पर कांग्रेसियों से निजी तौर पर अपने गुस्से का इजहार कर रहे हैं. इस राजनीतिक गुस्से और कुंठा का सच जानना जरूरी है.

संघ की विचारधारा और कार्यक्रमों को सिमी की विचारधारा और कार्यक्रमों से मिलाकर देखें तो राहुल गाँधी ने जो कहा है वह न केवल सौ प्रतिशत सच है बल्कि ऐसा सच जिसे कहने की कोशिश संघियों के हिसाब से अब कोई नहीं कर सकता. यह बयान उनकी परिपक्व राजनीतिक समझ को भी दर्शाता है. जो संघ परिवारी उन्हें भारतीय संस्कृति और आरएसएस के बारे में पढ़ने की सलाह दे रहे हैं उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि जो व्यक्ति आरएसएस, सिमी, फंडामेंटलिज्म और भारतीय संस्कृति को जानता होगा वही ऐसा बयान दे सकता है.

संघ (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) का लक्ष्य है, भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना तो सिमी(स्टुडेंट्स इस्लामिक मोवमेंट ऑफ़ इण्डिया) का लक्ष्य है, भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाना. भारत के संविधान के अनुसार क्या इस तरह के लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्ध संगठन सक्रिय रहने चाहिए? आरएसएस अपने लक्ष्य के लिए जहाँ हिन्दुओं को खतरे में दिखाकर तथा अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिन्दुओं में जहर भरता है वहीँ सिमी इस्लाम को खतरे में दिखाकर तथा हिन्दुओं तथा अन्य धर्मावलम्बियों के खिलाफ मुसलमानों में जहर भरता है. साधारण से साधारण भारतीय भी इस तथ्य से परिचित है. ये दोनों संगठन जो करना चाहते हैं और जिस तरह से करना चाहते हैं, राजनीति शास्त्र में इसे ही फंडामेंटलिज्म कहा जाता है. अब अगर राहुल गाँधी ने आरएसएस को सिमी की तरह फंडामेंटलिस्ट संगठन कहा है तो इसमें गलत क्या है? इसमें उनका ज्ञान और राजनीतिक समझदारी दिखती है अज्ञान नहीं. अज्ञान तो उनका दिखता है जो उन्हें भारत को जानने की सलाह दे रहे हैं. अगर आरएसएस को सिमी से तुलना खराब लगती है तो उसे अपने को बदलना चाहिए. ज्ञान और भारतीयता के ढोंग से असत्य का प्रचार कर भारतीयों को गुमराह नहीं करना चाहिए.

संघ परिवारी यह नहीं बता रहे हैं कि संघ और सिमी में क्या-क्या फ़र्क हैं. बस एक ही फ़र्क गिना रहे हैं कि सिमी प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन है, आरएसएस नहीं. वे फिर एक झूठ बोल रहे हैं. माना आज आरएसएस प्रतिबंधित नहीं है लेकिन भारत सरकार सिमी की तरह ही इसको भी एक से अधिक बार प्रतिबंधित कर चुकी है. आरोप कुछ- कुछ वैसे ही थे. एक सबसे जघन्य आरोप था- महात्मा गाँधी की हत्या का. ऐसा जघन्य आरोप तो सिमी पर कभी नहीं लगा. फिर, राहुल गाँधी ने सिमी से आरएसएस की समानता की तो गलत क्या किया? समय आ गया है कि राहुल गाँधी पर हमला बोलने की बजाय संघ एक-एक करके देश को बताये कि वह सिमी से किस तरह अलग है.

अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दोनों संगठन जो कार्य-पद्धति अपनाते हैं उसमें भी कई समानताएं हैं. भाजपा के माध्यम से संघ ने संसदीय राजनीति में जगह तो बनाई है लेकिन, अन्य घटकों की राजनीति को किसी भी मायने में संसदीय नहीं माना जा सकता है. स्वयं संघ का संगठन और सांगठनिक आदर्श सैन्यीकृत है. हिटलर और मुसोलिनी की कार्य-पद्धति उन्हें आदर्श लगती है. गुजरात में मुसलमानों के विरुद्ध भाजपा ने राज्य प्रायोजित आतंकवाद का नया चेहरा देश के सामने रखा. इसे पूरे संघ परिवार ने मिलकर अंजाम दिया था. गुजरात नरसंहार क्या आतंकवाद नहीं था? क्या सिमी ऐसा कर पाई है? बाबरी मस्जिद विद्ध्वंश का काम संघ परिवारियों ने किया. इस विद्ध्वंश ने देश के संवैधानिक ढांचे को चुनौती देने का काम किया.क्या यह आतंकवादी गतिविधि नहीं थी. क्या सिमी के ऊपर ऐसा कोई आरोप है?

अजमेर स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह विस्फोट का मामला हो या मालेगांव बम विस्फोट का मामला दोनों आतंकवादी घटनाएँ हैं और इन्हें अंजाम देने वाले संघ परिवारी ही थे. ये घटनाएँ वैसी ही थीं जैसी इस देश की संसद या मुंबई हमले की घटनाएँ. अगर राहुल गाँधी ने आरएसएस की समानता सिमी से की तो क्या गलत किया? उन्होंने एक राजनीतिक सच्चाई को अभिव्यक्त किया है जिसके लिए सभी धर्मनिरपेक्ष और अमन पसंद लोगों को उनकी तारीफ करनी चाहिए.

सोमवार, 23 नवंबर 2009

Now NSUI to pick up office bearers through election

Sun, Nov 22 09:20 AM
New Delhi, Nov 22 (PTI) As part of its efforts to ensure that deserving leaders get prominence, the NSUI will now elect its office bearers, dumping practice of selection under which the organisational heads were handpicked by the leadership. The organisational elections of the students'' body, which introduces democracy as part of Congress leader Rahul Gandhi''s ambitious plan of reaching out to all, is supervised by Foundation for Advanced Management of Elections (FAME).
FAME, founded by former chief election commissioner JM Lyngdoh, is an NGO of ex-election commission officials. In the new system, elections will be conducted at college, district, state and national levels.
The group also hopes to garner support of those students who have dislike for student politics. "The process of electing the national president will be completed after we have representatives elected in all the states.
A few party posts have been reserved for SCs, STs and OBCs. So, we hope to achieve inclusive representation by December, 2010," said Anand Pandey, NSUI national general secretary.
(More) PTI RRD JO.

मंगलवार, 12 मई 2009

in a grop photo with RGSC Chairman Sri Ashok Gehlot at his delhi residence


Participating in Presidential Debate In JNUSU elections, 2006


Adressing the meeting of MP State RGSC at Bhopal


Tribute to Rajiv Gandhi in RGSC meeting at bhopal by Anand Pandey


मंगलवार, 25 नवंबर 2008

More Women Take Part in DU Polls

More Women Take Part in DU Polls
Swaha Sahoo, Hindustan Times
New Delhi, August 25, 2008

The visibility of women candidates in the Delhi University Students Union (DUSU) elections is on the rise, especially from the National Students Union of India (NSUI).
NSUI, the youth wing of the Congress party, claims they are actively encouraging women to enter national politics. And what can be a better platform than DUSU polls.
At least nine women from NSUI are lobbying for a ticket to fight this year’s elections. The last three DUSU presidents have been NSUI women leaders. And many of them have made a smooth transition to national politics.
In 2007, Amrita Dhawan, who was president of DUSU for 2006-07, was given a ticket to fight for MCD polls.
“I lost by only 400 votes. But the fact remains I was given a ticket and all because of my work done as a member of NSUI,” said Dhawan.
“The Advisory Council of NSUI has a policy of giving at least 33 per cent representation to women,” said Anand Pandey, spokesperson, NSUI.
“I became the All India president of NSUI soon after winning DUSU election in 1995-96,” said Alka Lamba, secretary, All India Congress Committee.
“I was given an opportunity at university level. Today I am the youngest AICC secretary,” Lamba said.
“Critics say women candidates win because of their glamour. I ask girls to prove everyone wrong with their work and commitment,” Lamba said.
However, the same rules applied to both men and women candidates, Pandey said. “Both have to have a clean record, they must be socially active and have good communication skills,” he said.
In contrast, opposition students’ group Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP) claims it is just ideologically supported by the BJP. Thus women candidates are not directly absorbed into party politics.
“BJP does not support ABVP financially or with muscle power. But if DUSU women leaders want to join the BJP they are welcome,” said Monika Arora, the DUSU president from ABVP during 1993-94.
Arora fought for MLA seat in 2007 and lost by a small margin.
“ABVP has lots of women candidates who have potential. Perhaps better strategy and a curb on financial and muscle power in DUSU elections will give them a better chance at winning,” Arora said.

सोमवार, 10 नवंबर 2008

Former DUSU leaders jump

Former DUSU leaders jump
Hamari Jamatia Posted online: Nov 01, 2008 at 1558 hrs
New Delhi, October 31 : Years after they impressed the young minds of Delhi University with peppy slogans, former office-bearers of the Delhi University Students Union (DUSU) are now eyeing the upcoming Assembly elections. If the number of interested candidates is any indication, the elections will see a number of young faces, experienced in the art of politics since their student days, fighting for the coveted posts.
According to NSUI sources, at least six former office-bearers of DUSU and two DU student activists are in the race for Congress tickets. Big names include Ragini Nayak, Anil Choudhary, Virendra Singh Vaishist, Harsh Chaudhury, Ashok Basoya and Alka Lamba. From the ABVP, Nakul Bhardwaj and Anil Jha are leading the camp for fresh faces in the BJP. Other names include Jaiveer Rana, Jitender Choudhury, Ajay Choudhury, Ashish Sood and Satish Upadhyay.
When asked if being “new” contestants will in a way jeopardise their chances to win, a former DUSU office-bearer, on condition of anonymity, said: “Being young does not mean we are new. Each student leader has been actively working for the last few years and so people in their area know them well and that is what counts.”
Commenting on whether winning the DUSU elections will help in preparing for the Assembly elections, a former ABVP leader said there is a huge difference between the two. “From the point of the ABVP, DUSU elections only help in learning about the organisational structure of a party and nothing else,” he said.
For both NSUI and ABVP, student leaders are expected to bring a youthful image to their area. Mukesh Shukla, an ABVP leader said: “When young people in the age of 30-35 contest against older contestants, they give a youthful image to campaigning. Also, being former leaders of DUSU, they get students to campaign for them.”
When not contesting, student activists are also expected to help in campaigning for other candidates of the Congress and the BJP.
Anand Pandey, the national spokesperson of NSUI, says, “Before elections, there is door-to-door campaigning to be done and on the day of the elections there are hundreds of booths to be looked after. Obviously, the students play a big role in mobilising supporters.”

विचरना मीरा के देश में ख़रामा-ख़रामा

विचरना मीरा के देश में ख़रामा-ख़रामा -आनंद पांडेय मीरा भक्ति-आंदोलन की सबसे समकालीन लगनेवाली कवयित्री हैं। वे आज भी हमारे मन-मस्तिष्क को...